इंदौर [मध्य प्रदेश, भारत], 16 अगस्त: जब एक ही कक्षा के कई बच्चे पढ़ने में पीछे हों, तो सबसे ज़रूरी सवाल यह होता है कि किस बच्चे को बेहतर पढ़ाई की ज़रूरत है, और किस बच्चे को डिस्लेक्सिया जैसी कोई विशिष्ट अधिगम समस्या (स्पेसिफिक लर्निंग डिसऑर्डर) हो सकती है?
यह फ़र्क करना जितना आसान लगता है, उतना है नहीं। ASER 2024 के अनुसार, ग्रामीण भारत में कक्षा 3 के केवल 27.1% बच्चे कक्षा 2 के स्तर का पाठ पढ़ पाए । कक्षा 5 तक भी यह आँकड़ा सिर्फ़ 48.8% रहा। यानी केवल कमज़ोर पढ़ाई देखकर न माता-पिता, न शिक्षक, न विशेषज्ञ यह कह सकते हैं कि बच्चे को डिस्लेक्सिया है।
और यहीं असली डिस्लेक्सिया वाला बच्चा भीड़ में खो जाता है।
“जब पूरी कक्षा में पढ़ने की दिक्कत आम हो, तो डिस्लेक्सिया वाला बच्चा अलग से नज़र नहीं आता,” इंदौर की डॉ. विनी झारिया, नैदानिक एवं बाल मनोवैज्ञानिक (आरसीआई पंजीकृत), संस्थापक, उर्जस्विनी चाइल्ड डेवलपमेंट सेंटर और उर्जस्विनी स्पेशल स्कूल, इंदौर ने इसपर जानकारी साँझा की । “सवाल सिर्फ़ यह नहीं है कि बच्चा अपनी कक्षा से पीछे है या नहीं। असली सवाल है कि वह क्यों पीछे है, उसे अब तक क्या और कैसे पढ़ाया गया, और जब उसे व्यवस्थित ढंग से सिखाया जाता है, तब वह कैसी प्रगति करता है।”
डॉ. झारिया एक दशक से अधिक समय से 5,000 से अधिक बच्चों और परिवारों के साथ काम कर चुकी हैं।
डिस्लेक्सिया आख़िर है क्या? विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के ICD-11 वर्गीकरण में डिस्लेक्सिया को “पढ़ने में कठिनाई के साथ विकासात्मक अधिगम विकार” (6A03.0) कहा गया है।
इसमें बच्चे को शब्दों को सही पढ़ने, धाराप्रवाह पढ़ने या पढ़ा हुआ समझने में लगातार और गहरी कठिनाई होती है। यह कठिनाई बच्चे की उम्र और समझ के स्तर से कहीं ज़्यादा होती है।
WHO यह भी स्पष्ट करता है कि अगर पढ़ने की कमज़ोरी की असली वजह ये हों, तो उसे डिस्लेक्सिया नहीं कहा जाता:
- पढ़ाई का पर्याप्त अवसर न मिलना ।
- बौद्धिक विकास में कमी ।
- आँख या कान की समस्या ।
- पढ़ाई की भाषा पर पकड़ न होना ।
- पारिवारिक या भावनात्मक प्रतिकूल परिस्थितियाँ ।
भारत में दो अलग समस्याएँ, एक जैसी दिखती हुई
एक तरफ़ बड़ी संख्या में बच्चे अपनी कक्षा के स्तर पर पढ़ नहीं पा रहे। विश्व बैंक इसे “लर्निंग पॉवर्टी” कहता है, यानी लगभग 10 वर्ष की उम्र तक एक सरल पाठ पढ़कर न समझ पाना। विश्व बैंक के एक पुराने आकलन में भारत में यह दर लगभग 56% आँकी गई थी।
दूसरी तरफ़, भारतीय शोधों के 2023 के एक व्यवस्थित विश्लेषण के अनुसार लगभग 8% बच्चों में स्पेसिफिक लर्निंग डिसऑर्डर हो सकता है। शोधकर्ताओं ने यह भी माना कि भारत में इस विषय पर उच्च गुणवत्ता वाले जनसंख्या-आधारित अध्ययन अभी कम हैं।
“अगर कक्षा के 20 बच्चे ठीक से नहीं पढ़ पा रहे, तो यह मान लेना कि सबको डिस्लेक्सिया है, नैदानिक दृष्टि से गलत होगा,” डॉ. झारिया कहती हैं। “किसी को बेहतर पढ़ाई चाहिए, किसी की पढ़ाई बीच में छूटी, किसी को भाषा या ध्यान की दिक्कत है। और इन्हीं के बीच वे बच्चे भी हैं जिन्हें सच में डिस्लेक्सिया है।” पढ़ने में कठिनाई एक लक्षण है। डिस्लेक्सिया उसकी कई संभावित वजहों में से एक है।
इसीलिए डिस्लेक्सिया की जाँच किसी एक रीडिंग टेस्ट से नहीं हो सकती।
हिंदी पढ़ने में डिस्लेक्सिया कैसा दिखता है? ज़्यादातर जानकारी अंग्रेज़ी पढ़ने के हिसाब से लिखी जाती है। पर हिंदी की लिपि, देवनागरी, अलग तरह से काम करती है। इसमें अक्षर, मात्राएँ और संयुक्ताक्षर मिलकर शब्द बनाते हैं।
इसलिए हिंदी में डिस्लेक्सिया के संकेत कुछ ऐसे दिख सकते हैं:
- अक्षर पहचान लेता है, पर उन्हें जोड़कर शब्द नहीं पढ़ पाता ।
- मात्राओं में बार-बार गलती, जैसे छोटी इ और बड़ी ई, या उ और ऊ में भ्रम, सिखाने के बाद भी ।
- संयुक्ताक्षरों (क्ष, त्र, ज्ञ, द्ध, स्त) पर अटकना या उन्हें छोड़ देना ।
- अक्षर-अक्षर करके बहुत धीरे पढ़ना, जिससे वाक्य का अर्थ बीच में खो जाए ।
- जाने-पहचाने शब्द भी हर बार नए जैसे पढ़नाव् ।
हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों: जाँच इसलिए और ज़रूरी – बहुत से भारतीय बच्चे घर पर हिंदी बोलते हैं, स्कूल में अंग्रेज़ी में पढ़ते हैं, और एक साथ दो लिपियाँ सीखते हैं।
भारतीय शोधकर्ताओं द्वारा विकसित DALI (Dyslexia Assessment for Languages of India) इसी समझ पर बना है कि भारतीय बच्चे अक्सर दो या अधिक लिपियों में पढ़ना सीखते हैं, इसलिए जाँच भी उन सभी भाषाओं में होनी चाहिए। इसे अंग्रेज़ी, हिंदी और मराठी में तैयार और मानकीकृत किया गया।
“सिर्फ़ इसलिए किसी अंग्रेज़ी माध्यम के बच्चे को डिस्लेक्सिक कहना कि उसकी अंग्रेज़ी रीडिंग कमज़ोर है, जल्दबाज़ी होगी,” डॉ. झारिया कहती हैं। “देखना होगा कि बच्चे को अंग्रेज़ी का कितना अनुभव मिला, उसकी बोलचाल की भाषा कैसी है, और हिंदी में वह कैसे पढ़ता है।”
महत्वपूर्ण है पूरा पैटर्न: दोनों भाषाओं में, सभी कौशलों में, पढ़ाई के इतिहास में, और सही मदद मिलने के बाद की प्रगति में।
सबसे अहम संकेत: सही ढंग से सिखाने के बाद क्या होता है?
डिस्लेक्सिया की पुष्टि हो या न हो, पढ़ने में संघर्ष कर रहे बच्चे को मदद तुरंत चाहिए। पर सही मदद के बाद बच्चा कैसी प्रगति करता है, यह जाँच के लिए बहुत कीमती जानकारी देता है।
स्ट्रक्चर्ड लिटरेसी एक ऐसा तरीका है जिसमें ध्वनियाँ, अक्षर-ध्वनि का संबंध, वर्तनी के नियम, शब्द-रचना और समझ, सब कुछ स्पष्ट रूप से, क्रम से और बार-बार दोहराकर सिखाया जाता है। इंटरनेशनल डिस्लेक्सिया एसोसिएशन इसे डिस्लेक्सिया वाले बच्चों के लिए विशेष रूप से उपयोगी मानता है।
“ट्यूशन और विशेष रीडिंग इंटरवेंशन एक चीज़ नहीं हैं,” डॉ. झारिया कहती हैं। “जो बच्चा पहले से नहीं समझ पा रहा, उसे वही चीज़ और ज़्यादा घंटे करवाने से अक्सर सिर्फ़ उसकी हताशा बढ़ती है।”
इसलिए माता-पिता का सवाल यह नहीं होना चाहिए कि “कितने महीने ट्यूशन हुई?”
सवाल यह होना चाहिए: “ठीक-ठीक क्या सिखाया गया, कैसे सिखाया गया, और बच्चे की पढ़ाई में असल में कितना सुधार हुआ?”
डिस्लेक्सिया बुद्धि की कमी नहीं है – डिस्लेक्सिया वाले बच्चे औसत, औसत से अधिक या अलग-अलग बौद्धिक क्षमता वाले हो सकते हैं। वे तर्क अच्छा कर सकते हैं, सामान्य ज्ञान में आगे हो सकते हैं, सुनी हुई कहानी गहराई से समझ सकते हैं, फिर भी छपे शब्द ख़ुद पढ़ने में संघर्ष करते हैं।
“माँ अक्सर पूछती हैं, ‘सब समझती है, फिर यह पैराग्राफ़ क्यों नहीं पढ़ पाती?’ यही सवाल जाँच की दिशा तय करता है,” डॉ. झारिया कहती हैं। “अगर पढ़ने का बोझ हटते ही समझ बेहतर हो जाए, तो पढ़ने की प्रक्रिया को बारीकी से देखना ज़रूरी है।”
ट्यूशन बढ़ाने से पहले ये पाँच सवाल पूछें–
1. ठीक-ठीक कौन-सा कौशल कमज़ोर है? अक्षर पहचानना, शब्द जोड़ना, धाराप्रवाह पढ़ना, समझना या वर्तनी?
2. क्या वह कौशल बच्चे को स्पष्ट रूप से सिखाया गया? किताब सामने होना और सिखाया जाना, दो अलग बातें हैं।
3. क्या दिक्कत हर भाषा में है, या मुख्यतः पढ़ाई की भाषा में?
4. क्या व्यवस्थित मदद से मापने योग्य सुधार हुआ? घंटों से ज़्यादा मायने इस बात के हैं कि कौन-सा कौशल सीखा गया।
5. क्या कोई और कारण भी जुड़ा है? ध्यान, बोलचाल की भाषा, भावनात्मक तनाव या पढ़ाई में रुकावट।
“जाँच का उद्देश्य कभी लेबल लगाना नहीं होना चाहिए,” डॉ. झारिया कहती हैं। “उद्देश्य यह समझना है कि बच्चा क्यों संघर्ष कर रहा है, ताकि अगली मदद पिछली से ज़्यादा सटीक हो।”
जल्दी पहचान का मतलब जल्दी लेबल नहीं – बहुत से माता-पिता इस डर से जाँच टालते हैं कि बच्चे पर ठप्पा लग जाएगा। पर देर की भी कीमत होती है।
जो बच्चा पहले कहता है “यह मुझसे नहीं पढ़ा जाता”, वही धीरे-धीरे कहने लगता है “मैं बुद्धू हूँ”, “मुझे पढ़ाई से नफ़रत है।”
“जाँच दरवाज़े खोलती है, बंद नहीं करती,” डॉ. झारिया कहती हैं। “जब हम बच्चे को समझ लेते हैं, तो उसकी लापरवाही को दोष देना बंद करते हैं, बेअसर तरीके दोहराना बंद करते हैं, और वही सिखाना शुरू करते हैं जो असल में छूटा है।”
किसी बच्चे के लिए जवाब डिस्लेक्सिया होगा, किसी के लिए नहीं। पर दोनों बच्चे सही जवाब के हक़दार हैं।
60 सेकंड की जाँच: माता-पिता ख़ुद से पूछें–
- क्या मेरे बच्चे को नियमित स्कूली पढ़ाई और उचित शिक्षण मिला है?
- क्या उसकी उम्र और बाकी क्षमताओं के हिसाब से पढ़ना उसके लिए कहीं ज़्यादा कठिन है?
- क्या कोई और पढ़कर सुनाए, तो वह कहीं बेहतर समझता है?
- क्या ट्यूशन और अभ्यास के बावजूद सुधार उम्मीद से बहुत कम है?
- क्या हिंदी में भी मात्राओं, संयुक्ताक्षरों या धीमी पढ़ाई की दिक्कत बनी हुई है?
- क्या यह समस्या लंबे समय से लगातार है, कुछ दिनों की नहीं?
अगर कई जवाब “हाँ” हैं, तो विस्तृत मूल्यांकन यह समझने में मदद कर सकता है कि बच्चा क्यों संघर्ष कर रहा है।
यह निदान की सूची नहीं है। यह गहराई से देखने का संकेत है।
डॉ. विनी झारिया के बारे में – डॉ. विनी झारिया नैदानिक एवं बाल मनोवैज्ञानिक (आरसीआई पंजीकृत, CRR No. A70412), TEDx वक्ता, और उर्जस्विनी चाइल्ड डेवलपमेंट सेंटर व उर्जस्विनी स्पेशल स्कूल, इंदौर की संस्थापक एवं क्लिनिकल डायरेक्टर हैं। एक दशक से अधिक के नैदानिक अनुभव और 5,000 से अधिक बच्चों व परिवारों के साथ काम के आधार पर, उर्जस्विनी चाइल्ड डेवलपमेंट सेंटर में मनोवैज्ञानिक व विकासात्मक मूल्यांकन, बच्चों व किशोरों का मानसिक स्वास्थ्य, अधिगम कठिनाइयाँ और स्पेसिफिक लर्निंग डिसऑर्डर की जाँच व संरचित हस्तक्षेप उपलब्ध है।
महत्वपूर्ण सूचना– पढ़ने में कठिनाई कई कारणों से हो सकती है। यह लेख माता-पिता और शिक्षकों की जागरूकता के लिए है। उचित पेशेवर मूल्यांकन के बिना इसके आधार पर डिस्लेक्सिया या स्पेसिफिक लर्निंग डिसऑर्डर का निदान न करें।

